एन्जल टैक्स : कॉमर्स की कन्या
मी - त्तो... एमबीए?
वो - नों।
मी - देन... बीबीए.. राइट?
वो - नॉट एट ऑल?
मी - तो यहां, इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में क्या कर रही हो?
वो - तुम यहां क्या कर रहे हो? आई एम् श्योर कि तुम मैनेजमेंट से नहीं हो।
मी - सही है.. पर मैं वही कर रहा हूं जो करने आया हूं।
वो - क्कया? मैं भी वही कर रही हूं।
दरअसल मैं, मेरे रुममेट के साथ रविवार काटने इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट गया था। कुछ था वहां, ये तो पहले भी पता था, पर इतना कुछ था, ये वहां जाने के बाद पता लगा। प्रीमियम फुड्स एंड ड्राई फुड्स के स्टॉल लगे थे बाहर, जिनका एक ग्राम भी मैं नहीं खरीद सकता था। ड्रेस मैंने अच्छे ही पहन रखे थे, रे बेन लिखा नकली चश्मा भी था, पर गले में गमछा बता रहा था कि मैं मैनेजमेंट से तो नहीं हूं। वहां सारे के सारे लोग मैनेजमेंट छाप ड्रेस में थे। असली माहौल कॉन्फ्रेंस रूम था। कोई मेहुल चौक्सी बन स्टेज पर आया और अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब अच्छे से देकर चला गया। सवाल वाकई स्मार्ट थे, पर जवाब भी कोई कम नहीं थे। एक पल के लिए लगा कि हल्ला बेकार मचा हुआ है, मेहुल भाई तो गाय आदमी हैं। फिर इसी प्रकार निरव मोदी, अम्बानी, अडानी सहित विराट कोहली, अनुष्का शर्मा आदि भी आये। इसका अंत ह्रितिक रोशन और कंगना रनौत के आने के बाद होना था। लोग बेसब्री से दोनों का इंतजार कर रहे थे। ह्रितिक के स्टेज पर आने के बाद मैंने फिर सिलसिला शुरू किया।
मी - मैं बस संडे स्पेंड करने आ गया हूं।
वो - गुड।
वो स्टेज पर कंसन्ट्रेट कर रही थी।
मी - तुम?
वो - क्या तुम?
मी - मतलब, तुम भी संडे...!
वो - नो.. इतनी भी खाली नहीं हूं मैं। अभी ह्रितिक के बाद जो कंगना आएगी ना.. शी इज माय इल्डर सिस्टर।
मी - आई एम फ्रॉम सोशल साइंस।
वो - लग ही रहा था कि आर्ट्स से हो.. आई एम फ्रॉम कॉमर्स फैकल्टी।
मुझे लगा कि उसे आर्ट्स और सोशल में अंतर समझाना चाहिए। तब तक कंगना स्टेज पर आ चुकी थीं। वो अब पहले से अधिक कंसनक्ट्रेट होकर स्टेज की ओर देख़ रही थी। उधर कंगना बड़े ही आसानी से सारे सवाल का जवाब दे रही थी। पर पूरे एपिसोड में मुझे सबसे अधिक बोरिंग और बेकार ह्रितिक और कंगना वाला पार्ट ही लगा था। सबसे अच्छा स्टीव जॉब्स का था।
मैंने सिलसिला फिर स्टार्ट किया।
मी - तुम कोमर्स की हो... तब तो तुम्हें एन्जल टैक्स के बारे में मालूम होगा?
वो - तुम प्लीज दो मिनट शांत रह सकते हो? और ये एन्जल टैक्स के बारे में मुझे नहीं पता।
मी - ओकेय देन...!
मैंने कंगना से सवाल पूछने के लिए अपना हाथ उठाया। एक माइक मेरे पास आया।
मी - कंगना जी..., क्या आपको एन्जल टैक्स के बारे में पता है?
कंगना - हां.. बिलकुल पता है पर मैं बताना नहीं चाहती।
मी - ओके... बट.. क्या आप ये बता सकती हैं कि आप क्यूं नहीं बताना चाहती?
कंगना - आपने अपना परिचय नहीं दिया। सवाल पूछने से पहले परिचय देना होता है।
मी - इस नाचीज को रोहित कहते हैं।
कंगना - आर्ट्स के हो?
इस पर हॉल में बैठे हर एक मुंह से हंसी छूट गयी। उन खिलखिलाहटों में एक प्रकार का धिक्कार छिपा था।
मी - हां आर्ट्स से ही हैं... बिरला बी..!
मेरे ये कहते ही सन्नाटा छा गया। मैंने गुमान में अपना सर झुका लिया। मेरे बगल में बैठी कन्या जिससे मैं सिलसिला स्टार्ट करने का प्रयत्न कर रहा था, वो मुझे काट खाने वाली नजरों से देखे जा रही थी। अंततः मैंने बैठना ही बेहतर समझा। मुझे लग रहा था कि ये संडे मनहूस निकलने वाला है, पर तभी कंगना बोल उठीं।
कंगना - इतनी देर में एक ही सवाल ढंग का आया है मेरे सामने। हाल में बैठे सभी लोगों को एन्जल टैक्स के बारे में मालूम है, पर माहौल भारी हो चला है, इसलिए मैं बताना चाहूंगी कि एन्जल टैक्स मुझ पर लगने वाला एक स्पेशल टैक्स है। क्योंकि सरकार में बैठे लोगों को पता नहीं क्यूं लगता है कि कंगना रनौत एक एन्जल है।
हॉल में बैठे लोगों को कंगना का ये जवाब पसंद आया। तालियों और ठहाकों से माहौल हल्का हुआ, पर दो लोग अब भी शांत थे। मैं अंदर से ख़ुश था पर ताली नहीं बजा रहा था। वहीं मेरे आशा के विपरीत बगल में बैठी कन्या अब भी आग बबूला थी। जैसे कि उसका नाम एन्जल प्रिया जैसा कुछ हो।
मी - पता लगा? कि एन्जल टैक्स किसे कहते हैं?
वो कुछ बोले बिना ही वहां से उठ कर तेजी से हॉल से बाहर चली गयी। मुझे लगा कि ऐसे वक्त पर आदमी को इशारा समझना चाहिए। कुछ सेकेण्ड बाद मैं भी हॉल के बाहर आ गया। वो मुझे कहीं दिखी नहीं, पर मुझे शक था कि वो महिला प्रसाधन में गयी होगी। कुछ देर इंतजार के बाद मेरा शक सही साबित हुआ।
नजर मिलते ही मैंने हाय कहा।
वो - अब क्या है?
मी - त्तोह्... एन्जल टैक्स तुम पर भी लगता है?
वो - हाउ चीप यू आर...!?
तब तक तिवारी, मेरा रूम मेट भी बाहर आ गया था और सब देख़ चुका था। वो दोबारा हॉल के भीतर चली गयी। जो लोग तिवारी को जानते होगें उन्हें पता होगा कि तिवारी कितना कोर्टयस आदमी है। मतलब किसी के लिए मुंह से निकालना तो दूर, वो मन में भी किसी का बुड़ा नहीं सोच सकता। ब्राह्मण में सदासयता को लेकर जितने गुण अब तक देखे गए हैं, तिवारी में उससे भी एक अधिक है।
हमलोग इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेनेजमेन्ट के प्रांगन से बाहर सड़क पर आ चुके थे। तब तिवारी ने कहा कि उसे जिंदगी में पहली बार लगा कि गाली दे देना चाहिए।
तिवारी - दो-चार मिनट रुक जाते ना सर, तो पक्का आज मुंह से गाली निकल जाना था।
मी - क्या करें तिवारी अब? बत्ताओ.... इससे अच्छा लाइन कोई कैसे मार सकता है, फिर भी वो चीप कह कर चली गयी।
तिवारी - आप गलत जगह ट्राय ही मारे सर। ये कोमर्स वाली लड़कियों को दिमाग़ कहां होता है ! आप देखे कि मेनेजमेन्ट वाली जो कंगना बनी थी उसे समझ में आ गया।
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