रिव्यु : काशी टेल, लेखक - ओम प्रकाश राय 'यायावर'

 


ओमप्रकाश राय ‘यायावर’ की ‘काशी टेल’, पुस्तक के कवर पेज पर पुस्तक का नाम कुछ इस फॉण्ट में लिखा है कि इस रिव्यु के लिखने के पहले तक मुझे लगा जैसे पुस्तक का नाम ‘काशी रेल’ हो. मैंने कई लोगों को इसी नाम के साथ पुस्तक रिकोमेंड भी कर दी.

 

बनारस शहर ही कुछ ऐसा है कि यहां समय व्यतीत करने वाले किसी व्यक्ति को बनारस के ऊपर लिखी किसी पुस्तक से संतुष्टि नहीं मिलेगी. उस नजरिये से देखें तो यह पुस्तक भी निराश ही करती है. हालांकि पुस्तक काशी को समर्पित है भी नहीं, इसलिए, पुस्तक का उस दृष्टि से रिव्यु करना लेखक के साथ कहीं ना कहीं नाइंसाफी ही होगी. पुस्तक एक विशुद्ध प्रेम कहानी है जो बनारस के प्रांगन अर्थात बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के इर्दगिर्द घटी. नायक और नायिका सहित, पुस्तक के अधिकतर पात्रों का सम्बन्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय से है. लेखक ने सच ही कहा है, ‘’बनारस, एक शहर में दो शहर बसते हैं, क्योंकि BHU अपने आप में एक शहर ही तो है, पर बिना बनारस के BHU ना सिर्फ अधूरा है बल्कि असतित्वहीन है.’’

‘’बी. एड, मतलब एक ऐसा कोर्स, जिसमें अमूमन हर क्षेत्र के असफल, अपनी बेरोजगारी के चक्रव्यूह का अंतिम दरवाजा तोड़ने का भागीरथ प्रयास करते नजर आते हैं, किस्मत के मारों का एक सामूहिक मिलन बिंदु’’. बी. एड के सभी छात्र- शिक्षकों पर यह बात कितनी लागू होती है ये तो नहीं पता, पर कहानी के नायक पर यह बात सौ प्रतिशत सही बैठती. कहानी के मुताबिक, इंट्रेंस एक्जाम में ही नायक को नायिका मिलती है, और संयोग से दोनों इंट्रेंस में पास भी हो जाते हैं और फिर नजदीकी बढ़ने के बाद प्रेम निरन्तर सोपान चढ़ता है. नायक सिविल सेवा की तैयारी भी कर रहा होता है पर इसे लेकर वो बहुत सीरियस नहीं था. संयोग से नायिका मुस्लिम है और एक सिविल सर्वेंट की बेटी है, जिसके पिता उसकी शादी किसी सिविल सर्वेंट से ही कर सकते हैं. नायक हिन्दू है पर इसे लेकर उतनी परेशानी नहीं है, क्योंकि नायिका के माता-पिता भी क्रमशः हिन्दू-मुसलमान ही हैं.

किताब में बी. एड. कोर्स के पहलुओं को इस प्रकार छुआ गया है कि पढ़ते हुए ऐसा लगा कि करियर गाइडेंस को ध्यान में रख कर लिखी गयी हो. 

पुस्तक, नायक के ब्रह्मचर्य और नायिका के साथ अध्यात्मिक प्रेम के बीच चलने वाले द्वंद को भी उकेरने का प्रयास करती है. कई बार ऐसा लगता है कि लेखक, धर्मवीर भारती के 'गुनाहों का देवता' को रिक्रिएट करने की कोशिश कर रहा है. प्रसंगवश, 'प्रेम दुनियां का सबसे कठिनतम कार्य है साथ ही सबसे पवित्र भी. इसके अभाव में आप चाहे लाख ब्रह्मचर्य और किसी जटिल साधना का अभ्यास करते रहें, आपकी पवित्रता हमेशा संशय के घेरे में रहेगी.''

पुस्तक में वही कमी है जो कमोबेश हरेक हिंदी के लेखक में होता है. स्त्री-विमर्श. लेखक, नायक के भीतर चल रहे झंझावात को पन्ने पर उतारने में कामयाब रहे पर नायिका के साथ स्पष्ट अन्याय हुआ है. फिर भी हिंदी के पाठकों को इस सबसे फर्क नहीं पड़ता है.

कहानी के दौरान लेखक ने न्यायोचित तरीके से शेरो-शायरी का भी प्रयोग किया. जैसे कि नायक के सवाल पर नायिका पलट का जवाब देने के बदले उल्टा सवाल ही पूछ देती, या फिर खुद चुप रह जाती.

प्रसंगवश,

‘’हर सवाल का जवाब सवाल नहीं होता,

आसमां का हर चमकता सितारा बेमिशाल नही होता

ये सच है कि मौन सर्वोत्तम भाषण है

पर हर बार चुप रहना मिशाल नही होता’’

किताब की इंडिंग हैप्पी है. काशी को थोड़ा बहुत जानने और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कैम्पस में पनपने वाले प्रेम संबंधों की प्रकृति को समझने के लिए, यह पुस्तक एक बार पढ़ी जानी चाहिए.

बियोंड रिव्यु – किताब के लेखक और नायक दोनों अलग अलग हैं और दोनों से मेरी अच्छी जान पहचान है, हां नायिका से एकाध बार ही मिला हूं और संभव है उसे मेरे बारे में पता भी ना हो. मेरी जानकारी के अनुसार कहानी में काफी मिलावट है. जिसे मैं उजागर भी नहीं करना चाहता. बस एक प्रसंग याद है, जब मैंने पहली बार नायिका को देखा था. सुबह सबेरे घाट के उस पार रेत में नायक का जन्मदिन मनाने का प्लान था. सब कुछ तैयार था और हमलोग नायिका के आने का इंतजार कर रहे थे. हवा थोड़ी तेज थी, बड़े प्रयास के बाद हमलोग मोमबत्ती जला पाए थे. लेकिन हवा के झोंके ने मोमबत्ती को एक बार फिर बुझा दिया जिस पर मैंने नायक से कहा था कि हवा आज आवारा हो चुकी है कहीं दूसरे जगह चल कर जन्मदिन मनाते हैं. जिस पर नायक ने नकारते हुए कहा, ‘’नहीं मनायेगें तो यहीं, पर तुमने सच ही कहा कि हवा आवारा हो चुकी है, वो देखो वो बिना बुर्का के आ रही है’’. नायिका को दूर से ही हमलोगों ने पहचान लिया था. आम दिनों के उलट वो उस दिन बिना बुर्के में आई थी. इसलिए नायक ने हवा के आवारा होने वाली बात पर मेरे हां में हां मिलायी थी.

कुछ दिन बाद नायक कई दोस्तों के साथ कैफे में बैठे हुए शायद चाय पी रहे थे. मैंने उन्हें आँखों आँखों में हाय बोला पर वो कहीं मग्न थे, बल्कि जिस लाइन को वो अपने दोस्तों के सामने प्रस्तुत करने जा रहे उसमें वो किसी का खलल नही चाहते थे. लाइन थी,

‘’यूं नकाब हटाना,

यूं बेपर्दा होना,

यूं मचलते हुए रेत पर चल कर आना

ये सब उनकी अदा थी,

मैं तो बस बेकार ही हवाओं को आवारा समझ बैठा था’’

वहां उनकी मित्र मंडली में बैठे कई लोगों को इन लाइनों की उत्त्पति का अंदाजा बखूबी था. पर किताब में इस प्रसंग या इन लाइनों का जिक्र तक कहीं नहीं हुआ है. इसका क्षोब मुझे हमेशा रहेगा.

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