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एन्जल टैक्स : कॉमर्स की कन्या

मी - त्तो... एमबीए? वो - नों। मी - देन... बीबीए.. राइट? वो - नॉट एट ऑल? मी - तो यहां, इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में क्या कर रही हो? वो - तुम यहां क्या कर रहे हो? आई एम् श्योर कि तुम मैनेजमेंट से नहीं हो। मी - सही है.. पर मैं वही कर रहा हूं जो करने आया हूं। वो - क्कया? मैं भी वही कर रही हूं। दरअसल मैं, मेरे रुममेट के साथ रविवार काटने इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट गया था। कुछ था वहां, ये तो पहले भी पता था, पर इतना कुछ था, ये वहां जाने के बाद पता लगा। प्रीमियम फुड्स एंड ड्राई फुड्स के स्टॉल लगे थे बाहर, जिनका एक ग्राम भी मैं नहीं खरीद सकता था। ड्रेस मैंने अच्छे ही पहन रखे थे, रे बेन लिखा नकली चश्मा भी था, पर गले में गमछा बता रहा था कि मैं मैनेजमेंट से तो नहीं हूं। वहां सारे के सारे लोग मैनेजमेंट छाप ड्रेस में थे। असली माहौल कॉन्फ्रेंस रूम था। कोई मेहुल चौक्सी बन स्टेज पर आया और अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब अच्छे से देकर चला गया। सवाल वाकई स्मार्ट थे, पर जवाब भी कोई कम नहीं थे। एक पल के लिए लगा कि हल्ला बेकार मचा हुआ है, मेहुल भाई तो गाय आदमी हैं। फिर इसी प्रकार निरव मोदी, अम्बानी, अडानी सहित विर...

वो चाँद

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परसों वो चाँद दिखा मुझको दीप्त जमीं को उसर किये कुछ पूछ रहा था वो मुझसे क्या बात करूं फिर मैं तुमसे एक तुम भी कहो, दो मेरी सुनो फिर दिल से कहो कि चलते बने     वो चाँद दिखा कल फिर मुझको शायद कोस रहा था वो खुद को पर दंभ अभी था भरा नहीं शायद घाव था उसका हरा अभी दुखती नजरों से साँस लिया कुछ कहे बिना ही चलता किया     फिर चाँद दिखा था आज मुझे कशिश को अपने साथ लिए पूर्णिमा सी चमक रही एक टीस चुभी थी तब मुझको हल चल भी हुयी थी सीने में कि क्या बात करूं मैं फिर उससे     दो पल ही सही पर बैठा रहा सागर में उठते लहरों को भीतर मैं अपने सहता रहा कुछ गज की ही तो दूरी थी कुछ पल को क्या मैं देर हुआ सूरज ने उसको थाम लिया     फिर चाँद दिखेगा कल मुझको सूरज की किरणों से लिपटी हल्की सी सही पर रंगीनी अहंकार लिए अंधकार तले मैं घूर के देखूंगा उसको अपनी उष्मा, प्रकाश लिए     वो चाँद सही, मैं तारा गलत अस्तित्वरहित, एकांकीपन मजबूर नही पर है मुझको शायद उस चाँद की जरूरत अ...

स्त्री और बुधत्व

स्त्री और बुधत्व! ज्यादा दूर नहीं जाते हुए, बुद्ध की पत्नि यशोधरा का ही उदाहरण लेते हैं! क्या यशोधरा भी बुधत्व को प्राप्त नहीं कर सकती थी? कर सकती थी। पर बुद्ध ने यशोधरा को उसी जाल में फंसाया, जिसमें आजकल के मॉडर्न पति अपने पत्नियों को फंसा देते हैं! प्रेग्नेंसी? हां.. यही! पर बुद्ध यहीं नहीं रुके! उन्हें पता था कि सीता ने राम का पीछा नहीं छोड़ा था। इसलिए बुद्ध ने राहुल के जन्म तक का इंतजार किया और उसके बाद फिर देर नहीं किया। अगले दिन ही निकल लिए। राहुल तब, ठीक से एक दिन का भी नहीं हुआ था। पर प्रश्न तो यह भी है कि जिन प्रश्नों के जाल को, बुद्ध बचपन से ही सुलझाने का प्रयत्न कर रहे थे, वे प्रश्न यशोधरा के मन में क्यूं नहीं आये? 12 वर्ष बाद, जब बुद्ध वापस घर को आये, तब यशोधरा ने अपने विरह का प्रतिशोध लेना शुरू किया! और फिर यशोधरा खुद अपने ही अंत का कारण बन गयीं! लगभग चिहुंकते हुए योशोधरा, बुद्ध से पूछती हैं कि क्या बुद्ध को अपनी पत्नि पर इतना भी भरोसा नहीं था, जो वो अपने जाने की सूचना, अपनी पत्नि को नहीं दे सके! यशोधरा, 'अरे! आपको क्या लगा, मैं आपको रोक लेती? अरे! मैं भी क्षत्राणी हूं,...

निशा

  सुनसान गली में जब घुप्प अंधेरा था तो यौवन स्पर्श पाने आ जाती थी। पर कभी छेड़खानी भी हुआ हो, ऐसा सुन्ने को तो नहीं मिला। संभव है दुष्कर्म भी हुआ हो, पर वो मुजरिम और पीड़ता के बीच ही दफ़न होकर रह जाता था। फिर एक दिन नगर-निगम वालों ने भेपर लाइट लगा दिया। सुनसान गली जगमगा तो उठी पर पहले से अधिक सुनसान हो गयी। क्योंकि अब कोई वहां स्पर्श पाने नहीं आता। फिर एक दिन स्पर्श हुआ, जिसे 'निशा' की माँ ने छेड़खानी बताया और अब 'निशाचर' दुष्कर्म की सजा काट रहा है। मुजरिम के अनुसार, सारी गलती नगर-निगम वालों की है। 'निशा' का भी यही मानना है पर उसे आसपास कोई वकील नहीं मिल रहा।

रिव्यु : काशी टेल, लेखक - ओम प्रकाश राय 'यायावर'

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  ओमप्रकाश राय ‘यायावर’ की ‘काशी टेल’, पुस्तक के कवर पेज पर पुस्तक का नाम कुछ इस फॉण्ट में लिखा है कि इस रिव्यु के लिखने के पहले तक मुझे लगा जैसे पुस्तक का नाम ‘काशी रेल’ हो. मैंने कई लोगों को इसी नाम के साथ पुस्तक रिकोमेंड भी कर दी.   बनारस शहर ही कुछ ऐसा है कि यहां समय व्यतीत करने वाले किसी व्यक्ति को बनारस के ऊपर लिखी किसी पुस्तक से संतुष्टि नहीं मिलेगी. उस नजरिये से देखें तो यह पुस्तक भी निराश ही करती है. हालांकि पुस्तक काशी को समर्पित है भी नहीं, इसलिए, पुस्तक का उस दृष्टि से रिव्यु करना लेखक के साथ कहीं ना कहीं नाइंसाफी ही होगी. पुस्तक एक विशुद्ध प्रेम कहानी है जो बनारस के प्रांगन अर्थात बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के इर्दगिर्द घटी. नायक और नायिका सहित, पुस्तक के अधिकतर पात्रों का सम्बन्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय से है. लेखक ने सच ही कहा है, ‘’बनारस, एक शहर में दो शहर बसते हैं, क्योंकि BHU अपने आप में एक शहर ही तो है, पर बिना बनारस के BHU ना सिर्फ अधूरा है बल्कि असतित्वहीन है.’’ ‘’बी. एड, मतलब एक ऐसा कोर्स, जिसमें अमूमन हर क्षेत्र के असफ...